मीना बाई
मीना बाई — प्रसव से पहले की देखभाल ने बचाई एक माँ और बच्चे की जान
मंडला जिले की मीना बाई को प्रसव के दौरान जटिलताओं का सामना करना पड़ा। PSEF की स्वास्थ्य कार्यकर्ता की सतर्कता और आयुष्मान भारत सहायता ने माँ-बच्चे दोनों की जान बचाई।
वो रात जो कभी नहीं भूलूँगी
मंडला जिले के नैनपुर ब्लॉक की रहने वाली मीना बाई (28 वर्ष) अपनी तीसरी गर्भावस्था में थीं। पहले दो बच्चे घर पर ही हुए थे — दाई की सहायता से। लेकिन इस बार कुछ अलग था।
"आठवें महीने में मुझे बहुत तेज सिरदर्द था, आँखों के आगे अँधेरा आने लगा था। हमें लगा यह सामान्य है।"
PSEF की ASHA कार्यकर्ता ने पकड़ा खतरे का संकेत
PSEF की प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता सविता दीदी नियमित गृह-भ्रमण पर थीं। उन्होंने मीना बाई के लक्षण देखे और तुरंत पहचाना — यह प्री-एक्लेम्पसिया (उच्च रक्तचाप की खतरनाक स्थिति) के संकेत थे।
सामान्य दाई के भरोसे रहती तो क्या होता? सविता दीदी ने यह सोचने का मौका नहीं दिया।
PSEF की त्वरित कार्रवाई
पहले 2 घंटे
- सविता दीदी ने PSEF हेल्थ को-ऑर्डिनेटर को तुरंत सूचित किया
- आयुष्मान भारत कार्ड की जाँच — मीना के पास था
- जिला अस्पताल मंडला में बेड बुकिंग का प्रबंध
- गाँव से 42 किमी की दूरी के लिए PSEF एम्बुलेंस सहायता
अस्पताल में
- आपातकालीन सिजेरियन प्रसव
- माँ और बच्चे दोनों सुरक्षित
- आयुष्मान भारत से पूरा उपचार निशुल्क — ₹38,000 का खर्च सरकार ने उठाया
PSEF का अनुवर्ती ध्यान
- 6 सप्ताह तक नियमित घरेलू देखभाल
- नवजात शिशु टीकाकरण पूरा
- पोषण किट और आयरन-फोलिक एसिड सप्लाई
माँ के शब्द
"सविता दीदी न होतीं तो मैं नहीं जानती क्या होता। उन्होंने मेरी जान बचाई, मेरे बच्चे की जान बचाई। PSEF हमारे गाँव का फरिश्ता है।"
बच्चे का नाम
मीना बाई ने बेटी का नाम रखा — सवित्री — अपनी PSEF दीदी सविता के नाम पर।
मंडला में PSEF स्वास्थ्य कार्यक्रम
| संकेतक | उपलब्धि | |--------|---------| | प्रशिक्षित ASHA कार्यकर्ता | 48 | | संस्थागत प्रसव में वृद्धि | 67% → 89% | | आयुष्मान कार्ड बनवाए | 2,800+ परिवार | | स्वास्थ्य शिविर | 36 प्रति वर्ष |
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